आपके प्रशन पढ़ कर लगा के आप लोग ये सब जानने के लीए उतावले हें तो पहले मैं आप को ये बता दूँ के भगवान् सब जगह है,.. सभी मैं है ,और सभी भगवन मैं ही हें समझने के लीए शरणागत होना पड़ेगा !अपना सब कुछ उसी की कृपा से प्राप्त मानना होगा! अपने कर्तापन को खत्म करना होगा ये वीचार की ये सब मेरे द्वारा हो रहा है छोड़ना होगा !तब आप पहली सीढी पर खड़े होंगे !रही बात अच्छे या बुरे कर्मो की तो जब तक आप आपने आप को ही करता मानते है तब तक आप ही पाप और पुण्य के भागी होते हैं और जब आप शरणागत हो जाते हैं तो भगवन के द्वारा ही सब कार्य सीद्ध होते हैं उस समय कोई भी कार्य पाप माय नही हो सकता ! समझने के लीए कुछ सूत्र हें सबसे पहले किसी संत की शरण में जन होगा तब वो आपको शरनागत कराएगा या रासता दीखायेगा धीरे धीरे आप कुपात्र से सुपात्र होंगे तब कही जाकर आप भगवन की शरण मैं समर्पण होंगे !दूसरा सूत्र है के लगातार भगवन shri हरी के नम का स्मरण किया जाए जो अप पर परसन हो कर आपको ख़ुद ही अपनी शरण में ले लेंगे और आपको पता ही नही चलेगा कब काया पलट हो गया!
आगे भी आपसे इसी तरेह सहयोग की आशा करता हूँ भगवन नारायण की कृपा से आपको आपके प्रश्नों के उत्तर आपको मीलते रहें!
सब पर नारायण संत कृपा बनी रहे
आपका
संत राम दस